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Sunday, February 19, 2017

नन्हीं पलकों के ख़्वाब

बड़े होते हैं
नन्हीं पलकों के ख़्वाब।
दूर ही सही,
उन्हें साफ़ दिखाई देते हैं।
वो दबाये रखती हैं दिल में
लंबे हौसलों की डोर,
और ढूंढ़ती रहती हैं
छोटी सी उम्मीद की सीढ़ी,
जो उठा दे उन्हें
ज़मीन से थोड़ा सा ऊपर,
तो उछाल दें
मौके का कोई पत्थर।
डोर से बांध के
अटका भर दें ख़्वाब से,
तो हौसला रस्सी हो जाए,
और ख़्वाब खिलौना।

आओ,
तुम भी किसी की सीढ़ी हो जाओ।

Monday, February 13, 2017

संत

संत की परिभाषा
बदल ली है,
अब मैं
बिना फ़ोन वालों को
संत कहता हूँ. 

Wednesday, February 8, 2017

नज़रिया

मैं
देखना चाहता हूँ
सबको
वैसा ही
जैसा मैं हूँ
अंदर।

मैं
देखना चाहता हूँ
खुद को
वैसा ही
जैसे सब हैं
बाहर।

Monday, January 23, 2017

You and I

I am but
A cloth,
And you
The substance
Filled inside.

Wednesday, September 19, 2012

होमलेस

दीवारें हैं,
दरवाज़े भी,
खिड़कियाँ हैं,
पर खुलती नहीं,
एक बिस्तर है,
रात सोने के काम आता है,
मेरे भी,
कंप्यूटर के भी,
और कुछ किताबों के,
एक कमरे, हॉल, और रसोई का,
पूरा अपार्टमेन्ट है,
पर तेरे बिना,
मेरे पास घर नहीं.

Saturday, August 20, 2011

बनाने को ज़िन्दगी

बेतरतीब, कई टुकड़े, साँसों के,
जैसे पिरो दिए हों धागे से,
बनाने को एक कठपुतली सी ज़िन्दगी..

चाट के अनगिनत मसालों जैसे,
एक दूजे पे पड़े, ऊपर नीचे,
बनाने को एक चटपटी सी ज़िन्दगी,

किसी नन्हे ने एक कागज़ पर,
कल के सीखे कुछ हर्फ़ उतारे हों,
कुछ पढ़ें ऊपर से तो कुछ नीचे से,
कुछ परे हम बड़ों की समझों से,
बनाने को एक खिलखिली सी ज़िन्दगी..

एक लम्हे की हंसी तू हंस ले,
एक आंसू कहीं पे मैं रो दूं,
जीने को एक ज़िन्दगी सी ज़िन्दगी..

नाचती, चटपटी सी, खिलखिली सी ज़िन्दगी..

Sunday, March 27, 2011

कमरे काटते हैं

फर्क है,
घरों में और कमरों में;
कमरे,
कई बार,
घर बन जाते हैं,
घर बन कर
पालते हैं,
बन जाते हैं,
आशियाना,
आसरा,
सहारा,
और न जाने कितना कुछ,
पर कभी कभी,
वापस बदलने लगते हैं,
घर कमरों में;
कमरे,
जो ज़्यादा समझते हैं,
ज़्यादा जानते हैं,
अक्सर ज़्यादा खतरनाक हो जाते हैं,
साधारण कमरों से,
जो कभी घर बने ही नहीं,
कमरे काटते हैं..

Wednesday, December 22, 2010

बादलों का डर कहाँ है

बादलों का डर कहाँ है,
डर तो केवल धूप का है,
धूप में ही तो ये डर पैदा हुआ है 
स्वप्न जो मैंने बुने हैं
बारिशों में धुल न जाएँ 
इस चमकती धूप में 
बादल कहीं आ घुल न जाएँ 
जब हुई बरसात डर तो पल में ही हवा हुआ है 
फकीरों को डर कहाँ है 
डर तो केवल भूप का है 
डर तो केवल धूप का है 
बादलों का डर कहाँ है...

Thursday, May 21, 2009

कुछ कुछ ज़िन्दगी..

ज़िन्दगी,
कुछ पन्ने,
कुछ बिखरे,
कुछ सिमटे,
कुछ संजोये..

कुछ रंग,
चमकीले,
कुछ गहरे,
कुछ बेरंग..

कुछ सपने,
कुछ झूठे,
कुछ सच्चे,
कुछ टूटे.

कुछ लोग,
कुछ अपने,
कुछ पराये,
कुछ, सब कुछ..

कुछ यादें,
कुछ मीठी,
कुछ खट्टी,
कुछ, चुभती..

कुछ आँखें,
कुछ मुस्काती,
कुछ भीगी,
कुछ, सूखी..

और
कुछ लम्हे,
कुछ पल,
और कुछ पलों की ज़िन्दगी...